दर्द का रिश्ता था ज़रा देर तक ठहरा
किए जतन, नहीं भरा, ज़ख्म था गहरा
डगमगाया एक पल मगर मैं फिर संभल गया
मेरे ज़मीर पर था उसके इमान का पहरा
चाँद की फ़िराक में रात भर फ़िज़ूल ही अब्र देखता रहा
कल तो खिड़की से झाँका था एक हसीन का चेहरा
'अकेला' तुमपे एहसान दोस्तों के इस कदर बड़े
तुम्हारे ही सिर बंधा सबके गुनाहों का सहरा
[अब्र - Sky; फ़िज़ूल - बेकार में]
~अकेला~
MarHabaa...
ReplyDeleteAise chand hamari khidki me kyun nahe dikhte
Wah janab wah kya khoob kaha hai.....tere hi sir bandhta raha sabke gunahon ka sehra
ReplyDeletegud one...abse main apne shayare andaz mein aapko comment.
ReplyDeleteSubhanAllah.. kya khub likha hai
ReplyDeleteहिंदी ब्लाग लेखन के लिये स्वागत और बधाई । अन्य ब्लागों को भी पढ़ें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देने का कष्ट करें
ReplyDeleteAshish... too good work from you.. i also like d the one you wrote for Tanay... very heart warming.
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