अजनबी बनकर दरमियाँ हमारे आज खामोशियाँ बैठी
आए बहुत करीब हम, फिर भी दूरियां बैठी
थरथराते होठों की अनकही के सन्नाटे
उन्ही की गूँज में चुप, दो शेहनाइयां बैठी
दिल के घरोंदे में कहीं एक शक्स बसता था
खाली हुआ मकान, अब सिर्फ़ तन्हाईंयाँ बैठी
अब जब ना मैं हूँ, ना तुम हो, फिर क्यों 'अकेला'
लोगों की जुबां पर, अपनी कहानियाँ बैठी
~अकेला~
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