Thursday, June 30, 2005

दरमियाँ

अजनबी बनकर दरमियाँ हमारे आज खामोशियाँ बैठी
आए बहुत करीब हम, फिर भी दूरियां बैठी

थरथराते होठों की अनकही के सन्नाटे
उन्ही की गूँज में चुप, दो शेहनाइयां बैठी

दिल के घरोंदे में कहीं एक शक्स बसता था
खाली हुआ मकान, अब सिर्फ़ तन्हाईंयाँ बैठी

अब जब ना मैं हूँ, ना तुम हो, फिर क्यों 'अकेला'
लोगों की जुबां पर, अपनी कहानियाँ बैठी

~अकेला~

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