Tuesday, June 28, 2005

रात के दूसरे पहर

रात के दूसरे पहर तेरी रूठी याद
जब दबे पाँव मेरे पास चली आती है
और रो रो कर मुझे रुलाती है

फिर उस की उदास और भीघी आँखों में
मैं भी भीग जाता हूँ
और उस की आंखों के मोती चुन कर
तेरी धुंधली सी तस्वीर बनाता हूँ
और उसे गले लगा कर मनाता हूँ

तब वो तेरी शिकायत होते हुए भी
कोई शिकवा करती नहीं
बस आह भरती जाती है
और इन सब आहों को
मेरी बाहों मैं नींद आ जाती है

कभी आओ यहाँ देखो तो सही
तुम्हारा कितना सामान बिखरा पड़ा है
मेरा घर कितना छोटा पड़ गया है
और तेरी यादों का ढेर कितना बड़ा है

आओ तो देखना इक इक लम्हा कैसे
सर झुकाए तेरे लिए खड़ा है
कभी आओ देखो तो सही

रात के दूसरे पहर तेरी रूठी याद
जब दबे पाँव मेरे पास चली आती है

~अकेला~

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