Friday, June 24, 2005

बेदर्द ज़माने

क्या पाएगा दुनिया से, ये बेदर्द ज़माने हैं
पत्थर के यहाँ दिल हैं, चमड़े की ज़बाने हैं

क्या देगी मुझे दुनिया, क्या मांगने में जाऊं
हाथ पांव हैं सलामत, क्या कम ये खजाने हैं

एक तेरा नाम लेकर, बस हो गए हैं रुसवा
हर तरफ़ है अपना चर्चा, अपने ही फ़साने हैं

तेरा ही जहाँ में, इक घर नहीं 'अकेला'
दिल लेने और देने की, यहाँ और भी दुकानें हैं

~ अकेला~

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