Saturday, June 25, 2005

याद

जब जब यह मौसम बदला, और नयी बहार छाये
खुदा की कसम तुम बहुत याद आए

गर्मियों में दिन भर सन्नाटे शोर करते हैं
शाम अकेले छत पर हम ख़ुद से बातें करते हैं
जब उस वक्त हवा का झोंका, मेरे दिल से होकर जाए
खुदा की कसम तुम बहुत याद आए

पतझड़ के मौसम का देखो, कुछ अजब है नज़ारा
फूल सभी मुरझाये, सूना है बाग़ सारा
जब टूट के शाख से पत्ता, मेरे कांधों को छूके जाए
खुदा की कसम तुम बहुत याद आए

बरसात के मौसम में दिन भर की बूंदा बांदी
भीगी हैं मेरी पलकें, गीली है दिल की वादी
ऐसे में कोई अनजाना सा, दो मीठी बात कर जाए
खुदा की कसम तुम बहुत याद आए

जाडों के दिन हैं छोटे, पर रात है बड़ी
कई साल जैसी लगती एक छोटी सी घड़ी
जब चटके कली कोई खेत में, धुप आँगन में लहराए
खुदा की कसम तुम बहुत याद आए

~अकेला~

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